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Friday, April 30, 2010

लघुकथा

 लघुकथा तीर्थयात्रा *विश्वनाथ भाटी " इस बार इच्छा है कि चारधाम कि यात्रा कर आऊं.सांसों का क्या भरोसा ,कब निकल जाये. "पार्वतीदेवी ने विजयबाबू के समक्ष अपनी बात रखी ."ठीक ही है अगर बेटा करवा रहा है तो कर ही आओ. "विजयबाबू ने अखबार का पन्ना पलटते हुए कहा. "ऐसा क्यों कहते हो,वो आपका बेटा नहीं है क्या ?""बेटा तो क्यों नहीं है मगर मैं उसे तुमसे ज्यादा जानता हूँ. इस बार भी कोई बहाना निकाल लेगा.""आपको भी है ना शक करने की आदत सी पड़ गयी है .पिछली बार तो ऐनमौके पर कंपनी का कामआ गया था वरना उसका तो पक्का पक्का मानस था.""मैं कब रोकता हूँ ,जाओ ना; यदि ले जाता है तो बढ़िया बात ही है""पोस्टमन..."गली में आवाज सुनाई दी .वह दौड़ी दौड़ी सी दरवाजे तक गयी .सुनील का ही ख़त था. उसकी आँखे चमक उठी ."यह लो ,सुनील का ख़त है शायद तीर्थयात्रा का समाचार भेजा हो."पार्वतीदेवी की नज़रें विजयबाबू के चेहरे पर टिक गयी."समाचार तो तीर्थयात्रा का ही है ,मगर किसी और का."विजयबाबू ने चश्मा अख़बार पर रखते हुए कहा. "और किसी का ;क्या मतलब?""लिखा है किअपने सास -ससुर को लेकर चारधाम कि यात्रा पर जा रहा हूँ.इस बार नहीं आ सकता .विचार मत करना .अचानक ही प्रोग्राम बन गया ."पार्वतीदेवी पत्थर बनी खुले पड़े ख़त को देखती जा रही थी. रसोईघर से सब्जी जलने कि गंध आ रही थी. विश्वनाथ भाटी ,वार्ड न ८,पो.तारानगर[चुरू] राजस्थान ०९४१३८८८२०९

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